
संवाददाता, नोवामुंडी
आज के आधुनिक दौर में जहां संयुक्त परिवार धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं और रिश्तों की गर्माहट कम होती दिखाई दे रही है, वहीं पदमावती जैन सरस्वती शिशु मंदिर, नोवामुंडी ने एक ऐसा भावुक और प्रेरणादायक आयोजन किया जिसने हर किसी के दिल को छू लिया।
शनिवार को विद्यालय परिसर में आयोजित दादा-दादी/नाना-नानी सम्मान समारोह संस्कार, सम्मान और पारिवारिक मूल्यों का जीवंत उदाहरण बन गया। कार्यक्रम में उपस्थित बुजुर्गों के चेहरे पर खुशी थी, तो कई आंखें सम्मान और अपनापन पाकर भावुक होकर छलक उठीं।

कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय प्रबंध समिति के सचिव चितरंजन बेहरा, प्रधानाचार्या सीमा पालित गुरु मां एवं उपस्थित दादा-दादी/नाना-नानी के संयुक्त करकमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत में ही सभी दादा-दादी एवं नाना-नानी का तिलक लगाकर एवं अंग वस्त्र भेंट कर सम्मान किया गया। यह दृश्य इतना भावुक था कि कई बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं। किसी ने अपने पोते-पोतियों को गले लगाया तो किसी ने भावुक होकर आशीर्वाद दिया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए प्रधानाचार्या सीमा पालित गुरु मां ने दादा-दादी और नाना-नानी के सम्मान को लेकर दमदार संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि “जिस घर में दादा-दादी का साया होता है, वहां संस्कार अपने आप पनपते हैं। आज की पीढ़ी आधुनिकता की ओर बढ़ रही है, लेकिन यदि बच्चों को संस्कार, अनुशासन और परिवार का महत्व कोई सिखा सकता है तो वह हमारे बुजुर्ग ही हैं। दादा-दादी और नाना-नानी परिवार की जड़ हैं, और जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है वही जीवन में मजबूत बनता है।”
उन्होंने आगे कहा कि आज रोजगार और भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं। माता-पिता शहरों में रह जाते हैं और बुजुर्ग गांवों में अकेले पड़ जाते हैं। ऐसे समय में बच्चों को अपने बुजुर्गों से जोड़ना और उनके प्रति सम्मान की भावना विकसित करना समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। विद्या भारती इसी उद्देश्य से ऐसे आयोजनों के माध्यम से संस्कारों को जीवित रखने का कार्य कर रही है।
कार्यक्रम में नन्हे-मुन्ने बच्चों द्वारा दादा-दादी एवं नाना-नानी के सम्मान में प्रस्तुत सुंदर गीत, मधुर संगीत और मनमोहक नृत्य ने सभी का मन मोह लिया। बच्चों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने ऐसा वातावरण बना दिया कि कई दादा-दादी भावुक हो उठे।
दादा-दादी पर आधारित नृत्य प्रस्तुति ने पूरे कार्यक्रम में भावनाओं का ऐसा रंग भर दिया जिसे देखकर उपस्थित लोग देर तक तालियां बजाते रहे। गीत, संगीत और नृत्य का अद्भुत एवं विजोड़ संगम कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता बन गया।
बुजुर्गों के मनोरंजन के लिए आयोजित “1 मिनट गेम” कार्यक्रम का सबसे आकर्षक हिस्सा बना। भीषण गर्मी के बावजूद दादा-दादी एवं नाना-नानी पूरे उत्साह और ऊर्जा के साथ खेलों में भाग लेते नजर आए। खेल के दौरान उनके चेहरों पर बचपन जैसी खुशी साफ दिखाई दे रही थी।
कई बुजुर्गों ने मुस्कुराते हुए कहा कि आज उन्हें अपने पुराने दिनों की यादें ताजा हो गईं। खेलों के दौरान हंसी, खुशी और अपनापन ऐसा दिखा मानो सभी अपने बचपन के दिनों में लौट गए हों।
साड़ी एवं धोती पहनाने की प्रतियोगिता में
प्रथम पुरस्कार — शांति दर्नल एवं सेनू बहादुर दर्नल
द्वितीय पुरस्कार — गीता देवी एवं विश्वनाथ ठाकुर
तृतीय पुरस्कार — चंपा देवी एवं जयगोविंद गुप्ता को प्राप्त हुआ।
वहीं डिस्पोजल गिलास से पिरामिड बनाने की प्रतियोगिता में
प्रथम पुरस्कार — जसमती बारिक
द्वितीय पुरस्कार — गौरांगो दास को प्राप्त हुआ।
अगले राउंड में
प्रथम पुरस्कार — नूनकी पान
द्वितीय पुरस्कार — लालती देवी को प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम के अंत में सचिव चितरंजन बेहरा ने उपस्थित सभी दादा-दादी एवं नाना-नानी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बुजुर्ग परिवार की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। उनका अनुभव, आशीर्वाद और संस्कार ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करते हैं। उन्होंने सभी के स्वस्थ एवं सुखी जीवन की कामना करते हुए विद्यालय के आगामी कार्यक्रमों में भी अपनी सहभागिता देने का आग्रह किया।
यह आयोजन केवल एक सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि समाज को यह संदेश देने का प्रयास था कि जिस परिवार में बुजुर्गों का सम्मान होता है, वही परिवार संस्कारों और खुशियों से समृद्ध बनता है।
आज जब लोग आधुनिकता की दौड़ में अपने रिश्तों और जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में यह कार्यक्रम समाज को यह याद दिलाने में सफल रहा कि दादा-दादी और नाना-नानी केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि हमारे संस्कार, संस्कृति और जीवन मूल्यों की सबसे मजबूत नींव हैं।
