
नोवामुंडी, झारखंड – आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई में अपनी पूरी ज़िंदगी झोंक देने वाले गुआ गोलीकांड के वीर साक्षी व संघर्षशील आंदोलनकारी डूरगुडिया सिरका का सोमवार को निधन हो गया। उनके देहावसान की खबर फैलते ही पूरा इलाका शोकमग्न हो उठा। 1 जनवरी 1943 को जन्मे सिरका आजीवन आदिवासी समाज के हक़, न्याय और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध रहे। उनका जाना क्षेत्र के लिए केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि एक युग, एक संघर्ष और एक प्रेरणा स्तंभ का अंत माना जा रहा है। बुधवार को सिरका के पैतृक गाँव राईका में शोकग्रस्त परिवार से मिलने स्वयं अनुमंडल पदाधिकारी महेंद्र छोटन उराँव और अंचल अधिकारी (नोवामुंडी) मनोज कुमार पहुँचे।

प्रशासनिक अधिकारियों की यह उपस्थिति उस सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में एक बड़ी संवेदनशील पहल के रूप में देखी गई, जहाँ लोग अपने प्रेरणादायी आंदोलनकारी के निधन से गहरे दुख में थे।
अधिकारीयों ने परिवार से मिलकर गहरी संवेदना व्यक्त की और हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया। तत्काल राहत के रूप में परिवार को एक क्विंटल चावल, 15 किलो दाल, 10 किलो चूड़ा, 2 किलो गुड़ तथा कंबल प्रदान किए गए, ताकि इस कठिन समय में परिवार को त्वरित सहायता मिल सके।

परिजनों से बातचीत के दौरान यह जानकारी भी सामने आई कि परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना, बहू के लिए मेहैय्या सम्मान योजना तथा राशन कार्ड जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त कर रहा है। अधिकारियों ने आश्वासन देते हुए कहा कि इन सभी योजनाओं का लाभ उन्हें समय पर और बिना किसी बाधा के मिलता रहेगा।
इ इसी क्रम में, सिरका की पोती की शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए अधिकारियों ने कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में उसके नामांकन की प्रक्रिया तेज करने के लिए विद्यालय की वार्डन से बात की। वार्डन ने आश्वस्त किया कि उसका नामांकन बहुत जल्द पूरा कर दिया जाएगा। यह कदम परिवार के लिए नई उम्मीद और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक बना। एसडीओ और सीओ ने अपने व्यक्तिगत मोबाइल नंबर परिवार के सदस्यों को सौंपते हुए कहा कि किसी भी परेशानी या आवश्यकता पर वे निसंकोच संपर्क करें—प्रशासन हर समय उनके साथ खड़ा है और खड़ा रहेगा। गाँववासियों ने भी अधिकारियों की इस मानवीय पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि डूरगुडिया सिरका जैसे महान आंदोलनकारी के प्रति सच्ची और संवेदनशील श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने जीवन को समाज की बेहतरी और संघर्ष की लौ जलाए रखने में समर्पित किया।
