पलामू की पगडंडियों से सपनों का सफर झारखंड के पलामू जिले के एक छोटे से गाँव पोखराहा कला की गलियों में एक युवक घूमता था, जिसकी आँखों में गाँव की सादगी थी लेकिन दिल में समंदर पार की मायानगरी के सपने।
वह युवक थे श्रवण ठाकुर। पलामू की जुझारू मिट्टी ने उन्हें वह जिद्दीपन दिया, जो मुंबई जैसे शहर में टिकने के लिए सबसे जरूरी है। जब वे पहली बार मुंबई की सरजमीं पर उतरे, तो उनके पास केवल अपना हुनर और अपनी मेहनत पर भरोसा था।
2. मुंबा देवी का आशीर्वाद और संघर्ष के दिन मुंबई में कदम रखते ही श्रवण ने सबसे पहले मुंबा देवी के दरबार में माथा टेका। कहते हैं कि जिस पर मुंबा देवी की कृपा हो जाए, मुंबई उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटने देती। श्रवण के लिए राह आसान नहीं थी, लेकिन उनकी कला के प्रति निष्ठा ने रास्ते खोल दिए। उन्होंने छोटे पर्दे से अपने सफर का आगाज किया। ‘जस्सी जैसी कोई नहीं’, ‘कर्मा’ और ‘पीहर’ जैसे कल्ट धारावाहिकों में अपनी अदाकारी से उन्होंने पहचान बनाई। ‘किस हद तक’ और ‘मोबाइल फोन’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के डंके को और बुलंद किया।
3. ‘ऑलराउंडर’ बनने की कहानी श्रवण केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहे। उनके भीतर का कलाकार नई ऊंचाइयों को छूना चाहता था। किस्मत ने मोड़ लिया और वे कोरियोग्राफी की दुनिया में उतरे। लगभग 19 हिंदी और मराठी फिल्मों में उन्होंने अपनी कोरियोग्राफी का जादू बिखेरा। ‘अजब सिंह की गजब कहानी’ और ‘चंद्र भागा’ जैसी फिल्मों में उनके काम ने यह साबित कर दिया कि वे बॉलीवुड के असली ‘ऑलराउंडर’ हैं। 4. निर्देशन और भक्ति का संगम अभिनय और नृत्य के बाद श्रवण ने कैमरे के पीछे की कमान संभाली। निर्देशन के क्षेत्र में ‘अधूरा इश्क’ (वेब सीरीज) और ‘प्यार का सफर’ जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके विजन को दुनिया के सामने रखा। हाल के वर्षों में टी-सीरीज और अल्ट्रा जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर उनके निर्देशित भक्ति संगीत—’बम भोले बम’ और ‘शिव ही मेरे शंभु’—ने लाखों दिलों को छुआ। यह उनकी कला और ईश्वर के प्रति उनकी आस्था का अनूठा संगम था। 5. 30 साल का गौरवशाली सफर आज श्रवण ठाकुर को मुंबई में 30 वर्ष पूरे हो चुके हैं। वे उन गिने-चुने कलाकारों में से हैं जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि तीन दशकों तक उसे कायम रखा। पलामू की माटी का वह बेटा आज बॉलीवुड के बड़े स्टार कास्ट वाली फिल्मों की तैयारी कर रहा है, लेकिन आज भी उनके दिल में वही पलामू की सादगी बसती है। श्रवण ठाकुर अक्सर कहते हैं— “मुंबई ने मुझे नाम दिया, काम दिया और पहचान दी, लेकिन पलामू की मिट्टी ने मुझे वो ताकत दी जिससे मैं आज भी बिना थके इस मुकाम पर खड़ा हूँ।”
कहानी के मुख्य आकर्षण (Bullet Points): जन्मभूमि: पोखराहा कला, पलामू (झारखंड)। शुरुआती पहचान: चर्चित टीवी शो ‘जस्सी जैसी कोई नहीं’ और ‘कर्मा’। बहुमुखी प्रतिभा: अभिनेता, कोरियोग्राफर (19 फिल्में) और सफल निर्देशक। भक्ति क्षेत्र: टी-सीरीज जैसे बड़े बैनर्स के साथ सफल भक्ति वीडियो का निर्देशन। अनुभव: मायानगरी मुंबई में 30 वर्षों का अटूट संघर्ष और सफलता।