
नोवामुंडी: लोकआस्था के महापर्व छठ के चौथे और अंतिम दिन बुधवार को नोवामुंडी के लखन साई स्थित ऐतिहासिक ओड़िया छठ तालाब पर श्रद्धा और भक्ति का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला।

कड़ाके की ठंड के बीच हजारों व्रतधारियों ने उदीयमान सूर्य (उगते सूर्य) को ‘भोर अर्घ्य’ अर्पित किया, जिसके साथ ही चार दिवसीय इस कठिन अनुष्ठान का विधिवत समापन हो गया।
भक्ति गीतों से गुंजायमान हुआ पूरा क्षेत्र

बुधवार तड़के करीब 4 बजे से ही पारंपरिक परिधानों में सजे व्रती अपने परिजनों के साथ सिर पर पीतल और बांस के दउरा-सूप लिए घाट की ओर कूच करने लगे। सूप में सजे केले की कांदी
, ईख (गन्ना) और ठेकुआ के साथ “कांच ही बांस के बहंगिया…” जैसे पारंपरिक छठ गीतों की मधुर गूंज ने पूरे नोवामुंडी के वातावरण को आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर दिया।

अटूट आस्था के आगे फीकी पड़ीं व्यवस्था की खामियां
श्रद्धालुओं की आस्था इतनी अडिग थी कि रास्ते की दुश्वारियां भी उन्हें रोक न सकीं। घाट तक पहुंचने वाले मुख्य मार्ग पर नाली का पानी बहने के कारण लोगों को भारी असुविधा हुई।
वहीं, तालाब के पानी के भीतर कंकड़ और पत्थर होने के कारण कई व्रतधारियों के पैरों में चोट लगने की भी शिकायतें सामने आईं। घाट की साफ-सफाई को लेकर श्रद्धालुओं ने प्रशासन और कमेटी के प्रति नाराजगी भी जताई

, लेकिन भगवान भास्कर की भक्ति के आगे ये तमाम बाधाएं गौण साबित हुईं। सिंदूर की रस्म और प्रसाद वितरण के साथ विदाई
जैसे ही सूर्य की पहली किरण क्षितिज पर प्रकट हुई, जलाशय में खड़े व्रतधारियों ने दूध और जल से भगवान भास्कर को अर्घ्य दिया। इसके पश्चात विधिवत हवन और आरती की गई। घाट पर मौजूद महिलाओं ने एक-दूसरे को नाक तक लंबा सिंदूर लगाकर सुहाग की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। समापन के बाद घाट पर बड़े पैमाने पर ठेकुआ और फलों का प्रसाद वितरित किया गया, जो देर सुबह तक चलता रहा।
