
उपवास रख किशोरियों ने जंगल से करम डाली लाकर की पूजा-अर्चना, कर्मा-धरमा की कथा सुनकर तोड़ा उपवास
नोवामुंडी में हर्षोल्लास से मना करमा परब, मांदर-नगाड़े की थाप पर रातभर गूंजे करमा गीत
नोवामुंडी संवाददाता,22 सितम्वर। मुंडा समाज का प्रमुख प्रकृति एवं भाई-बहन के प्रेम का पर्व करमा परब नोवामुंडी क्षेत्र में पारंपरिक रीति-रिवाज और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। पर्व को लेकर किशोरियों एवं महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। संध्या समय सूर्यास्त से पहले टाटा स्टील कैंप नोवामुंडी स्थित विशाल नाग के क्वार्टर परिसर में विधिवत करमा परब का आयोजन किया गया।
करमा परब को लेकर किशोरियों ने दिनभर उपवास रखा। इसके बाद बालीझरन के झरना किनारे स्थित जंगल से करम डाली लेकर मांदर और नगाड़े की थाप पर नाचते-गाते हुए वापस लौटीं। पारंपरिक गीतों और नृत्य के बीच करम डाली को पूजा स्थल तक लाया गया और विधि-विधान के साथ आंगन में स्थापित किया गया। करम डाली स्थापित होने के बाद पूजा-अर्चना की गई।
इसके उपरांत दुर्गा सांडिल और हरिश सांडिल ने संयुक्त रूप से करमा परब से जुड़ी पारंपरिक कथा सुनाई। कथा में दो सहोदर भाइयों कर्मा और धरमा के जीवन, उनके बीच के संबंध तथा जीवन में आए उतार-चढ़ाव का वर्णन किया गया। साथ ही सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा भी सुनाई गई। कथा के माध्यम से सत्य, कर्म, पारिवारिक एकता, भाई-बहन के प्रेम तथा अच्छे आचरण का संदेश दिया गया।

वहीं नोवामुंडी के डीवीसी डुकासाई में भी महाराणा परिवार के घर करम डाली स्थापित कर करमा परब मनाया गया। दोनों स्थानों पर करमा कथा के समापन के बाद उपवास रखने वाली किशोरियों ने पारंपरिक केमटा नृत्य प्रस्तुत किया और इसके बाद अपना उपवास तोड़ा।
करमा परब के दौरान पूरी रात पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम चलता रहा। पुरुषों ने मांदर और नगाड़े बजाकर वातावरण को संगीतमय बना दिया, जबकि महिलाओं ने समूह में पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया। पुरुषों द्वारा गाए गए करमा गीतों का महिलाओं ने गीत के माध्यम से जवाब दिया। देर रात तक चले इस सामूहिक नृत्य-गीत में नई पीढ़ी के साथ बुजुर्गों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया।

करमा परब मुंडा सहित कई आदिवासी समुदायों में प्रकृति, कृषि जीवन, भाई-बहन के स्नेह और सामुदायिक एकजुटता से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। करम वृक्ष की डाल को पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है। पर्व में विशेष रूप से कुंवारी एवं विवाहित महिलाएं व्रत रखकर परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली तथा भाई-बंधुओं के मंगल की कामना करती हैं। करम गीत और नृत्य इस पर्व की प्रमुख सांस्कृतिक पहचान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी करमा परब सामूहिक सहभागिता और पारंपरिक लोक संस्कृति को जीवंत रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।
आयोजन में हरि सुलांकी, मंगल सांडिल, हरिश जयमंगल नाग, धर्नुजय सांडिल, दुर्गा सांडिल, हरिश सांडिल, रमेश सोलंकी, प्रेमनाथ सोलंकी, मोहिनी महाराणा, हेमलता महाराणा, उर्मिला सांडिल, गीता सांडिल, ललिता तामड़िया, खगेश्वर महाराणा, तुनी तामड़िया, सबनम सुलांकी, नेहा महाराणा, प्रियंका महाराणा, अनुपमा बेहरा सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद रहे।
करमा परब में झारखंड के नोवामुंडी, जगन्नाथपुर, गुवा, बड़ाजामदा, रेंगाड़बेड़ा, आईकुटी, डांगोवापोसी समेत ओडिशा के जोड़ा एवं आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में मुंडा समाज के महिला-पुरुष शामिल हुए। विभिन्न क्षेत्रों से लोगों के पहुंचने से आयोजन स्थल पर देर रात तक उत्सव का माहौल बना रहा। मांदर की थाप, नगाड़े की गूंज और सामूहिक करमा गीतों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान रहा।
फोटो- नोवामुंडी में करम डाली लेकर आती महिलाएँ
