
प्रतिनिधि, नोवामुंडी नोवामुंडी तहसील के राजस्व ग्राम सरबिल में रविवार को सामाजिक सांस्कृ ति दस्तूर नवचेतना जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया.इस अवसर पर गांव के सीमांत क्षेत्र में पारंपरिक पत्थरगढ़ी दस्तूर भी हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा तथा विशिष्ट अतिथि टीएसएफ के हेड संदीप केसरवानी और प्रफुल्ल बोदरा थे , पत्थरगढी अनुष्ठान का विधिवत उदघाटन मधु कोडा ने किया,जबकि नवचेतना कार्यक्रम का उदघाटन केसरवानी और प्रफुल्ल बोदरा ने फीताकाटकर किया।

सात घंटे तक चले इस कार्यक्रम में समाज के प्रबुद्ध नागरिकों के साथ मानकी, मुंडा, डाकुवा एवं दिऊरी सहित समाज के जानकार लोगों ने आदिवासी समाज की लुप्तप्राय परंपराओं, रीति-रिवाजों, रूढ़ियों एवं दस्तूर पर विस्तार से चर्चा की।कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज में जन्म एवं मृत्यु संस्कार, शादी-विवाह, परब-त्योहार, सामाजिक मान्यताओं, रूढ़ि-परंपराओं तथा प्राचीन समय से लेकर वर्तमान आधुनिक दौर में आए बदलावों पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने कहा कि बदलते समय के साथ समाज में अनेक सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं, लेकिन अपनी मूल सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को भूलना चिंता का विषय है।

इसलिए नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना आवश्यक है।मागे पोरोब पर रहा विशेष जोरकार्यक्रम में मागे परब, बाह परब, हेरो परब, जोमना परब और बाबा हेरमोट सहित विभिन्न पारंपरिक पर्व-त्योहारों पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें मागे पोरोब पर विशेष रूप से फोकस किया गया। वक्ताओं ने मागे गुरी पोरोब, मारंग पोरोब, वासी पोरोब तथा हर बागेया पोरोब के महत्व और उनसे जुड़ी परंपराओं के बारे में जानकारी दी।वक्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान पीढ़ी का एक वर्ग अपनी पारंपरिक सभ्यता और संस्कृति से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। दूसरे समुदायों के पर्व-त्योहारों को अपनाने, दुर्गा पूजा, रथ यात्रा तथा सावन में कांवर लेकर बोल बम जाने जैसी परंपराओं के बढ़ते प्रभाव पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि अन्य समुदायों की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते हुए अपनी संस्कृति, भाषा, परंपरा और दस्तूर को भी समान रूप से संरक्षित रखना जरूरी है।जोनोम, गोनोए और आणादी दस्तूर पर हुई विस्तृत चर्चाकार्यक्रम में जानकार वक्ताओं द्वारा हो समाज के विभिन्न सामाजिक दस्तूरों को समझाने के लिए विस्तृत परिचर्चा की गई। जोनोम दस्तूर के अंतर्गत बार जी, जोनोंम बिसीई, कौआ होन, कुई होन तथा नरतः अ आदि विषयों पर चर्चा हुई।इसी प्रकार गोनोए दस्तूर के अंतर्गत गोनोए, सुतेम तोल, सबसीई, दिरी दुल सुनाम (दिरी माल) तथा जोम इसीन जैसे सामाजिक रीति-रिवाजों की जानकारी दी गई। वहीं आणादी दस्तूर के तहत दुतेम आंदि, पिरोति आंदि, रोका आंदि, ओपोर तिपिः आंदि, हिलि एरा को दुतेम आंदि, हिरूम चेतन आंदि, गोरजोम आंदि तथा सेता: आंदि आदि परंपराओं पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का आह्वानकार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि समाज की पहचान केवल आधुनिक विकास से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपरा, पर्व-त्योहार और सामाजिक दस्तूर से भी होती है। यदि नई पीढ़ी इन परंपराओं को नहीं समझेगी तो आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण सामाजिक परंपराएं विलुप्त हो सकती हैं।इसलिए नई पीढ़ी से अपनी हो संस्कृति, भाषा, सभ्यता, दस्तूर और पारंपरिक रूढ़ियों को समझने, उनका अध्ययन करने तथा संरक्षण करने की अपील की गई। कार्यक्रम में मौजूद मानकी, मुंडा, डाकुवा, दिऊरी एवं समाज के प्रबुद्ध लोगों ने कहा कि ऐसे जागरूकता कार्यक्रम गांव-गांव में आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सके और उसे आगे बढ़ा सके।पत्थरगढ़ी दस्तूर के साथ संपन्न इस कार्यक्रम का उद्देश्य सामाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक चेतना और पारंपरिक हो आदिवासी व्यवस्था के संरक्षण का संदेश नई पीढ़ी तक पहुंचाना रहा।
