
साधना से वीरता, वीरता से दिव्यता : आचार्य विश्वदेवानंद जी का संदेश
जमशेदपुर:
जमशेदपुर के विभिन्न यूनिटों के दौरा के पश्चात
आनंद मार्ग प्रचारक संघ के श्रद्धेय पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने आनंद मार्ग जागृति कीर्तन मंडप हॉल गदरा में
आज हजारों साधकों को संबोधित करते हुए आध्यात्मिक उन्नति और तंत्र साधना की महत्ता पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधना का मूल उद्देश्य मनुष्य को पशुता से उठाकर देवत्व की ओर ले जाना है, और यह क्रमोन्नति तंत्र के माध्यम से ही संभव है।
अपने प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक अवस्था में प्रत्येक जीव पशु प्रवृत्तियों से युक्त होता है, लेकिन उचित साधना, अनुशासन और आध्यात्मिक अभ्यास के द्वारा मनुष्य वीरता प्राप्त करता है और अंततः दिव्यता को प्राप्त करता है। उन्होंने तंत्र शास्त्र के संदर्भ में कहा –
“सर्वे च पशवः सन्ति तलवत् भूतले नराः।
तेषां ज्ञानप्रकाशाय वीरभावः प्रकाशितः।
वीरभावं सदा प्राप्य क्रमेण देवता भवेत्॥”
आचार्य विश्वदेवानंद जी ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए बताया कि प्रारंभ में मनुष्य का आचार-व्यवहार पशुवत होता है, किंतु साधना द्वारा वह आत्मिक उत्थान के मार्ग पर अग्रसर होकर क्रमशः वीरता एवं दिव्यता को प्राप्त करता है। इस यात्रा में साधक के उपास्य देवता भी उसके आध्यात्मिक स्तर के अनुसार परिवर्तित होते हैं – प्रारंभ में वह ‘पशुपति’ की आराधना करता है, वीरता की अवस्था में ‘वीरेश्वर’ को पूजता है, और जब वह दिव्य अवस्था को प्राप्त करता है, तब उसका इष्ट ‘महादेव’ बन जाता है।

उन्होंने साधना के विभिन्न स्तरों को स्पष्ट करते हुए कहा कि आध्यात्मिक मार्ग केवल वीरों के लिए है, कायरों के लिए नहीं। साधना का वास्तविक स्वरूप केवल बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि परमपुरुष के प्रति गहन प्रेम और समर्पण है।
साधकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा –
“जो इस महान साधना और त्याग के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, वे समाज में देवमानवों की संख्या बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। यह विश्व को एक नई दिशा देने का मार्ग है।”
सभी उपस्थित साधकों ने आचार्य विश्वदेवानंद जी के इस प्रेरणादायक प्रवचन को अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ सुना और साधना के मार्ग पर अग्रसर होने का संकल्प लिया।
