अचानक बागान की घेरा से झाड़ी नुमा औषधि पौधे गायब

जमशेदपुर:कहा जाता है कि पृथ्वी की गर्मी को कम करने के लिए घास का एक तिनका भी सहायक हो सकता है युद्ध के इस माहौल में बढ़ते प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से पृथ्वी के पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए, यह दिन सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करता है, आज समाज में बहुत सारे ऐसे पौधे लुप्त हो रहे हैं जो हर परिवार के सदस्य के रूप में विराजमान रहते थे जब से कंक्रीटीकरण का युग आया लोग अपने-अपने बाग बगीचे को घेराबंदी करने में कंक्रीट, ईटा पत्थर का व्यवहार करने लगे तो धीरे-धीरे समाज से लगभग 20 ऐसे औषधि प्रजाति के पौधे थे जो समाज से लुप्त हो रहे हैं

पहले वह परिवार के सदस्य के रूप में विराजमान रहते थे लगता था कि एक औषधिखाना के रूप में कोई खड़ा है परिवार का सदस्य । इन पौधों की खासियत यह थी कि इसको कोई भी जीव जंतु नुकसान नहीं करते थे कारण इनका दुर्गंध एवं विरेचक होने के कारण इसलिए इसे बागान घेरा जाता था , उनसे बागान भी हरा भार रहता था,उनका औषधीय महत्व भी बहुत ज्यादा था जैसे निर्गुंडी (सिंदुरवार) भी कहा जाता है हर बागान में झाड़ी नजर आता था लगभग जमशेदपुर शहर में कहीं खोजने से शायद मिल जाए इसे आदिवासी समाज में लोग किसी तरह के भी दर्द में इसका पत्ता का इस्तेमाल करते हैं

ऐसे आयुर्वेद में इसे एक ताकत वाली दवा बनती है निर्गुंडी गुड ।बाशा या वासक का पौधा यह बहुत ही औषधीय गुणों से भरपूर है यह पौधा बांग्ला एवं आदिवासी समाज में लोग खांसी एवं कफ़ की बीमारी में इसका उपयोग करते हैं
और आयुर्वेद में इससे एक दवा बनती है वासकाअवलेह। इस पौधा को भी कोई जीव जंतु नहीं नष्ट नहीं करता यह भी दुर्गंधयुक्त एवं विरचक है ।इसे भी बागान घेरा जाता था यह भी लगभग लुप्त हो गया बहुत ही खोजने पर कहीं मिलेगा तीसरा पौधा है आयापान का पौधा सुंदर लगता था इसे भी जीव जंतु नहीं नष्ट करता दस्त की बीमारी की दवा थी, झाड़ी में यह सब रहता था, नागदौना इसका पत्ता सांप के जैसा होता है इसके पत्ते से बवासीर की दवा बनती है, सेहुर के विभिन्न प्रजाति, नागफनी के विभिन्न प्रजाति, कनेर के विभिन्न प्रजाति श्वेत एवं लाल करवी , हड्डजोड़ की लता एवं अन्य तरह के लगभग 20 पौधे टाटा स्टील के जितने भी जमशेदपुर शहर में क्वार्टर थे उसका घेराव लोहे की पतली पट्टी से इसी तरह के औषधीय पौधे लगाकर किया जाता था और उससे उसे घेर में यही सब पौधे लगे होते थे अब तो ना वह बागान है और ना ही वह पौधा सबसे दुख की बात है यह कि इस तरह के पौधे नर्सरी में भी नहीं मिलते ।आपको जरूरत पड़े तो आप कहां खोजें । इसका कुप्रभाव केवल शहर में ही नहीं गांव देहात के में भी इसका प्रभाव पड़ा गांव देहात में भी लोग अपने बागान को ईट, कंक्रीट से घेरा कर रहे हैं। इन सब कर्म से दो हनी समाज को हुआ एक तो इन पौधों के औषधीय महत्व के विषय में जो जानते थे वही जाने और आने वाले पीढ़ी को को उनका औषधीय महत्व नहीं पता चला इसको दो पीढ़ी के बीच गैप कहा जाता है इससे सबसे ज्यादा हानि मानव जाति को है एक तरफ तो हरियाली गई और दूसरे तरफ इन पौधों के रहने से घरेलू नुस्खे वाली वनऔषधि चिकित्सा भी लुप्त होने लगी ।आनंद मार्ग एवं प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएलिटी टू एनिमल्स एंड प्लांट्स की ओर से गांव-गांव में औषधि पौधों की जानकारी देकर पौधे लगाने पर जोर दिया जाता है एवं पौधा का निशुल्क वितरण भी किया जाता है। सुनील आनंद औषधीय पौधों की जानकारी देते हुए बताते हैं कि अगर सृष्टि को बचाना है तो पौधा लगाना ही होगा।
