
ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक शक्ति को बढ़ाने पर जोर देना चाहिए
जमशेदपुर :आनंद मार्ग के सुनील आनंद ने आशीर्वाद वृद्ध आश्रम में पूजनीय बुजुर्गों के बीच आध्यात्मिक भाव को बढ़ाने पर बल देते हुए कहा कि
मनुष्य इस पृथ्वी पर बहुत कम समय के लिए आया है।
आप लोग बहुत भाग्यशाली हैं कि परमात्मा आपको अपने निकट पहुंचने के लिए एक रास्ता दिए हैं यहां कोई कुंठा नहीं यही बैकुंठ है । जहां मन में कोई क्लेश भावना नहीं रहे वही बैकुंठ है बैकुंठ का मतलब होता है कुंठा से मुक्त ,बहुत ही पवित्र स्थान है आप किस्मती लोग हैं आपको यह मूल्यवान समय आपके जीवन में मिला है जितना जिंदगी जिए और बचे हुए जिंदगी को परम पुरुष की सेवा में लगा दे परम पुरुष की सेवा करने के लिए केवल मन की आवश्यकता है, प्रभु का गुणगान करने से मन निर्मल होगा और आप परमआनंद की अनुभूति करेंगे आपकी उत्पत्ति इसी अनंत चेतन सत्ता से हुई है और आप इस अनंत चेतन सता का एक अंश है।

मनुष्य जीवन एवं मृत्यु के बीच संघर्ष का प्रतीक है मनुष्य को जीवन जीने की शक्ति परम पुरुष से मिलती है । परमात्मा एवं मनुष्य का संबंध मां एवं उसके गोद के छोटे बच्चे के जैसा संबंध हैं।जिस तरह मां अपने छोटे बच्चे को उसकी जरूरत के अनुसार से एवं कल्याणकारी भाव से सब कुछ समझ लेती है की बच्चे को क्या चाहिए क्या नहीं चाहिए। इस तरह परम पुरुष भी अपने बच्चों के जरूरत अनुसार सब कुछ देते हैं परंतु मनुष्य की शिकायत हमेशा परम पुरुष से रहती है कि परमात्मा मुझे कुछ नहीं दिए। मनुष्य अपने संस्कारगत कर्म से कष्ट भोग करता है उसके पीछे भी उसकी भलाई छुपी रहती है जिसे वह नहीं जान पता परंतु उसे भक्ति करने से इस बात का अनुभूति हो जाती है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी चल रहा है वह सब कुछ परम पुरुष की कृपा से चल रहा है ।इन सब बातों का अनुभव भक्ति के द्वारा ही संभव है परम पुरुष मानोकामना के प्रतीक नहीं भक्ति के प्रतीक है सबका कल्याण चाहते हैं जो हमारा दुश्मन है उनका भी कल्याण चाहते हैं और जो हमारा दोस्त है उनका भी कल्याण चाहते हैं परम पुरुष के लिए कोई भी घृणा योग्य नहीं । वह कल्याणमय सत्ता है इसलिए परम पुरुष को जानना है तो उनको जानने के लिए अपने मन के भीतर में स्थित परम चेतन सत्ता को भक्ति के द्वारा जाना जा सकता है । आप भक्तों ने दुनिया को यह बतला दिया कि दुनिया मे कितनी कड़ी से कड़ी मुसीबत आए उसका का सामना हर मनुष्य को करना होगा ना कि मैदान छोड़कर भाग जाना होगा मुसीबत को उपहार के रूप में स्वीकार करना होगा तभी मनुष्य अपने जीवन में बड़ा से बड़ा कार्य कर सकता है सुख और दुख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जहां सुख है वहां दुख भी है केवल सुख रहने से ही जीवन का अनुभव कभी नहीं हो सकता दुख का आना भी मनुष्य के जीवन में जरूरी है क्योंकि इससे मनुष्य को तथा आने वाली पीढ़ी को मुसीबत का सामना कैसे किया जाए सीखने का मौका मिलता है।
