
क्रिसमस केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए आशा, प्रेम और निकटता का एक सार्वभौमिक संदेश है। यह पर्व हमें एक गहरे सत्य की ओर ले जाता है कि ईश्वर मनुष्य से पूर्णता की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि करुणा से भरे हृदय की खोज करता है। वह भव्य भवनों, बाहरी चमक-दमक या आदर्श परिस्थितियों में नहीं, बल्कि साधारणता, संवेदनशीलता और अपनापन लिए हुए हृदय में वास करना चाहता है। क्रिसमस की बाइबिल कथा इसी सच्चाई को अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रकट करती है। मरियम और यूसुफ को ठहरने के लिए कोई स्थान नहीं मिला और एक गोशाला में, अभाव और असुरक्षा के बीच, एक शिशु का जन्म हुआ। यह केवल एक ऐतिहासिक विवरण नहीं है, बल्कि एक गहरा प्रतीक है। जब दुनिया ने जगह नहीं दी, तब भी प्रेम ने रास्ता बनाया। ईश्वर आदर्श परिस्थितियों की प्रतीक्षा नहीं करता। वह जीवन की अनिश्चितताओं, कमजोरियों और संघर्षों के बीच हमारे साथ उपस्थित होता है।
इस कथा में यह भी उल्लेखनीय है कि शुभ समाचार सबसे पहले राजाओं, शासकों या प्रभावशाली लोगों को नहीं, बल्कि साधारण चरवाहों को दिया गया। स्वर्गदूतों ने उनसे कहा, “डरो मत, क्योंकि मैं तुम्हें बड़े आनंद का शुभ समाचार देता हूँ, जो सब लोगों के लिए है।” यह वचन स्पष्ट करता है कि ईश्वर का प्रेम किसी एक वर्ग, समुदाय या विशेषाधिकार तक सीमित नहीं है। वह हर उस व्यक्ति तक पहुँचता है जो स्वयं को अकेला, उपेक्षित या हाशिए पर महसूस करता है। करुणा का स्वभाव ही यही है कि वह कमजोर की ओर झुकती है और उसकी गरिमा को पुनः स्थापित करती है। क्रिसमस का संदेश शक्ति, वैभव और प्रभुत्व की मानसिकता को चुनौती देता है। यह हमें याद दिलाता है कि मानवीय गरिमा धन, पद या सफलता से नहीं आँकी जाती। ईश्वर दिखावे के बजाय सादगी को, प्रभुत्व के बजाय विनम्रता को और नियंत्रण के बजाय संबंधों को महत्व देता है। यह दृष्टि हमें जीवन को एक नई नज़र से देखने का निमंत्रण देती है, जहाँ व्यक्ति का मूल्य उसके होने से तय होता है, न कि उसके पास क्या है, इससे। क्रिसमस के साथ शांति का विचार भी गहराई से जुड़ा है। स्वर्गदूतों का गीत गूंजता है, “धरती पर उन लोगों के लिए शांति, जिनसे वह प्रसन्न है।” यह शांति केवल युद्ध या संघर्ष की अनुपस्थिति नहीं है। यह हृदय की वह अवस्था है जहाँ भय की जगह भरोसा, स्वार्थ की जगह सहानुभूति और उदासीनता की जगह करुणा लेती है। ऐसी शांति आदेशों या दबाव से नहीं आती, बल्कि रिश्तों में सम्मान, संवाद और देखभाल से जन्म लेती है। इसलिए क्रिसमस का वास्तविक उत्सव केवल रोशनी, सजावट, उपहारों या सामाजिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। इसका सच्चा अर्थ हमारे दैनिक जीवन में प्रकट होता है। जब हम कठोरता के बजाय दया को चुनते हैं, सुविधा के बजाय ईमानदारी को अपनाते हैं और उदासीनता के बजाय करुणा दिखाते हैं, तब ईश्वर का प्रेम हमारे माध्यम से संसार में जीवित हो उठता है। धैर्य से किसी की बात सुनना, मन से क्षमा करना और बिना दिखावे के किसी की सहायता करना, ये छोटे-छोटे कर्म ही क्रिसमस की आत्मा को वास्तविक रूप देते हैं।
क्रिसमस हर धर्म, हर आस्था और हर दृष्टिकोण के व्यक्ति को आत्ममंथन का निमंत्रण देता है। क्या हमारे हृदय दूसरों के लिए खुले हैं। क्या हम पीड़ा, अकेलेपन और अनिश्चितता में जी रहे लोगों के प्रति सजग हैं। क्या हमारे संबंधों में ठंडापन बढ़ रहा है या करुणा की ऊष्मा। आज की तेज़, प्रतिस्पर्धात्मक और आत्मकेंद्रित दुनिया में क्रिसमस एक कोमल लेकिन दृढ़ स्मरण है कि ईश्वर भवन नहीं, हृदय चाहता है और दीवारें नहीं, करुणा खोजता है। जहाँ प्रेम को जिया जाता है, जहाँ मानवीय गरिमा का सम्मान होता है और जहाँ आशा बाँटी जाती है, वहीं क्रिसमस की आत्मा जीवित रहती है। यह क्रिसमस हमें फिर से एक-दूसरे के निकट लाए, हमारी संवेदनशीलता को जाग्रत करे और हमें यह याद दिलाए कि हम गहराई से प्रेम किए गए हैं। और वही प्रेम हमें एक-दूसरे के लिए अधिक मानवीय बनने की प्रेरणा दे।
डॉ. मुक्ति क्लेरेंस, एस.जे.
सहायक प्राध्यापक, XLRI, जमशेदपुर
