
वशीकार अवस्था में अस्तित्व महत् तत्व की ओर उन्मुख होती है
वशीकार में मन आत्मा के पूर्ण नियंत्रण में रहता है
जमशेदपुर:
आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार में आनन्दमार्ग के वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने “साधना” विषय पर प्रकाश डालते हुए साधना मार्ग के तीन विशेष स्तरों या क्रमों की बात कही। ये स्तर हैं — शाक्त, वैष्णव और शैव।
तीनों का पारमार्थिक मूल्य समान है। अर्थात किसी व्यक्ति को समर्थ रूप से देखकर यदि कोई आनन्दमार्ग को जानना या समझना चाहे तो उनमें से कोई भी स्तर असमर्थ नहीं होगा। शाक्त साधना में ही जैव भाव से शिव भाव के पथ पर पदयात्रा शुरू करनी होती है। इस पदयात्रा में पथिक की अग्रगति मुख्यतः प्रत्याहार योग में सिद्ध होती है। प्रत्याहार योग के माध्यम से साधक जगत सेवा शुरू करता है।

वैष्णव स्तर में निःस्वार्थ भक्ति का उदय होता है और शैव स्तर ब्रह्मस्वरूपता का भाव है। इस प्रकार शाक्त स्तर भोग और कर्म प्रधान है, भक्ति प्रधान नहीं। वैष्णव स्तर में कर्म और भक्ति की प्रधानता है तथा शैव स्तर ज्ञान स्वरूप का भाव है।
प्रत्याहार साधना के चार स्तरों को विस्तार से बताते हुए आचार्य जी ने कहा कि प्रत्याहार साधना के चार स्तर हैं — यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार।
यतमान है — वृत्ति प्रवाह से अपने को रोकने का प्रयास। इसमें मानसिक वृत्तियाँ निम्न की ओर उन्मुख होती हैं। व्यतिरेक में कई वृत्तियाँ नियंत्रित होती हैं और कोई नही होती। एकेन्द्रिय में वृत्तियाँ निम्न से ऊर्ध्व की ओर उन्मुख होती हैं। एकेन्द्रिय में वृत्ति समूह नियंत्रित होते हैं किन्तु स्वाभाविक भाव बना रहता है। वशीकार अवस्था में अस्तित्व महत् तत्व की ओर उन्मुख होती है और अंत में वशीकार सिद्धि होती है अर्थात जीव भाव का ईश्वर भाव में रुपान्तरण।
इस वशीकार में मन आत्मा के पूर्ण नियंत्रण में रहता है और साधक 50 मूल वृत्तियों पर नियंत्रण पा लेता है।
इस प्रकार साधना के विभिन्न स्तरों की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए आचार्य जी ने मत और पथ पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि आनन्दमार्ग का कोई विशेष मत, विशेष देश, काल तथा पात्र का समर्थक नहीं है। परिस्थितियाँ देश, काल तथा पात्र में अलग-अलग हो सकती हैं अर्थात मत बदलता है।
अतः मनुष्य विशेष का मत स्वयं देश, काल, पात्र के अनुरूप है अर्थात व्यावहारिक, कालसापेक्ष या पात्रसापेक्ष है। आनन्दमार्ग केवल एक कार्य कर सकता है और वह कार्य है अपने चरम लक्ष्य शिव की ओर गति करना या अपने विषयों की ओर लौट जाना — इस गति का ही नाम परमगति है।
यही एकमात्र पथ है। मत अनेक हो सकते हैं परंतु पथ एक ही है। यह पथ है ब्रह्मत्व की प्राप्ति। इस पथ में जीव विभिन्न विषयों पर स्थित और उनसे समन्वय स्थापित करते हुए समग्र जीवन को आध्यात्मिक रूप में रूपांतरित करता है।
यह कहना गलत है कि जितने मत हैं उतने पथ हैं। आनन्दमार्ग के अनुसार एक ही पथ है और वह है ब्रह्मप्राप्ति का पथ।
