
सरायकेला। मानवाधिकार सहायता संघ महिला प्रकोष्ठ की सरायकेला-खरसावां जिला अध्यक्ष श्रीमती सुमन कारूवा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देश के सफाई कर्मचारियों की स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जब पूरा शहर सो रहा होता है, तब सफाई कर्मचारी हाथों में झाड़ू लेकर शहर को स्वच्छ बनाने के लिए अपने काम में जुट जाते हैं।
सुमन कारूवा ने कहा कि नगर निगम एवं स्थानीय निकायों के सफाई कर्मचारी प्रतिदिन बदबूदार नालियों और कचरे के ढेर के बीच काम करने को मजबूर हैं। कई कर्मचारी बिना दस्ताने, मास्क और पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं, जिससे उनके गंभीर बीमारियों की चपेट में आने का खतरा बना रहता है।
उन्होंने कहा कि वर्षों तक काम करने के बावजूद कई सफाई कर्मचारियों की नौकरी स्थायी नहीं होती और उनका भविष्य भी सुरक्षित नहीं है। कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलने से उनके परिवारों का भरण-पोषण मुश्किल हो जाता है। वहीं, कम वेतन और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद छुट्टी लेने पर नौकरी जाने का डर बना रहता है।
सुमन कारूवा ने संबंधित पदाधिकारियों से सफाई कर्मचारियों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए विशेष ध्यान देने की मांग की। उन्होंने कहा कि देश को स्वच्छ रखने वाले सफाई मित्रों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, उचित वेतन और भविष्य को सुरक्षित करना आवश्यक है। सफाई कर्मचारियों को बेहतर सुविधाएं मिलने से वे सुरक्षित और स्वस्थ रहकर अपना कार्य कर सकेंगे तथा देश को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाए रखने में और बेहतर योगदान दे सकेंगे।
सरायकेला। मानवाधिकार सहायता संघ महिला प्रकोष्ठ की सरायकेला-खरसावां जिला अध्यक्ष श्रीमती सुमन कारूवा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देश के सफाई कर्मचारियों की स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जब पूरा शहर सो रहा होता है, तब सफाई कर्मचारी हाथों में झाड़ू लेकर शहर को स्वच्छ बनाने के लिए अपने काम में जुट जाते हैं। सुमन कारूवा ने कहा कि नगर निगम एवं स्थानीय निकायों के सफाई कर्मचारी प्रतिदिन बदबूदार नालियों और कचरे के ढेर के बीच काम करने को मजबूर हैं। कई कर्मचारी बिना दस्ताने, मास्क और पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं, जिससे उनके गंभीर बीमारियों की चपेट में आने का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि वर्षों तक काम करने के बावजूद कई सफाई कर्मचारियों की नौकरी स्थायी नहीं होती और उनका भविष्य भी सुरक्षित नहीं है। कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलने से उनके परिवारों का भरण-पोषण मुश्किल हो जाता है। वहीं, कम वेतन और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद छुट्टी लेने पर नौकरी जाने का डर बना रहता है।
